पुनर्वास कॉलोनी के लिए जमीन ली मगर फलदार पेड़ों का सही मूल्यांकन नहीं किया था, अब 49 प्रतिशत बढ़ोत्तरी के साथ मुआवजा देना होगा

चंडीगढ़। मलाेया में जिस जमीन पर प्रशासन ने पुनर्वास योजना के तहत मकान बसाए थे उस जमीन के मालिकों को अब कोर्ट ने उचित मुआवजा देने के आदेश प्रशासन को दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि याची पक्ष प्रशासन द्वारा फलों वाले पेड़ों के किए गए मूल्यांकन के 49 प्रतिशत बढ़ोत्तरी के हकदार हैं। वहीं गैर-फलों वाले पेड़ों के मूल्यांकन के दोगुणे मुआवजे के हकदार हैं। इसके अलावा कानून के संबंधित प्रावधानों के मुताबिक बनते लाभ के भी हकदार हैं। मलोया के अवतार सिंह समेत वहीं के राहुल वर्मा, सुदर्शन कुमार वर्मा और यश कुमार ने 2018 में यूटी चंडीगढ़ को लैंड एक्विजिशन कलेक्टर के जरिए पार्टी बना याचिकाएं दायर की थी। इन्हें संयुक्त रूप से सुनते हुए एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज अश्विनी कुमार ने यह फैसला सुनाया है।

सुनवाई के दौरान सुदर्शन की मौत पर उसके परिवार ने इस केस को आगे बढ़ाया था। कुल 167.55 एकड़ जमीन पुनर्वास योजना के तहत एक्वायर की गई थी। लैंड एक्विजिशन कलेक्टर ने यूटी प्रशासन की 2006 व 2007 की नोटिफिकेशन के आधार पर दिसंबर, 2017 में लैंड एक्विजिशन एक्ट के तहत अवार्ड पास किया था। कोर्ट ने पाया कि 2009 में जब जमीन एक्वायर की गई तब फलों और गैर-फलों के पेड़ों का मूल्यांकन नहीं किया गया था। एक अन्य अवार्ड में यह किया गया। कोर्ट ने ऐसे ही एक अन्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि उसमें प्रशासन ने अपील दायर नहीं की। ऐसी परिस्थितियों में एक जैसे हालातों वाले दो लाेगों में भेदभाव नहीं किया जा सकता। 2006 की नोटिफिकेशन के वक्त से पेड़ों का मूल्यांकन किया गया मगर इनकी वेल्यू 2004 के प्राइज इंडेक्स के हिसाब से की गई।

याचियों की फलों वाली और गैर-फलों वाली जमीन एक्वायर की गई थी। दायर केसों में अवार्ड को बढ़ाए जाने की मांग की गई थी। फलों वाली जमीन का कुल13 लाख रुपये और 2.32 लाख रुपये गैर-फलों वाली जमीन का अवार्ड पास हुआ था। आरोप लगाया गया कि सुपरस्ट्रक्चर/पेड़ों की कबाड़ के बराबर वैल्यू लगाई गई। वह पीडब्ल्यूडी द्वारा आंकी गई रकम 50 प्रतिशत बढ़ोत्तरी के साथ के हकदार हैं। कलेक्टर ने पेड़ों की सही उम्र का आंकलन नहीं किया था। वहीं फूलों की माकिट वेल्यू नहीं लगाई थी। उस दौरान याचियों को भी कोई जानकारी नहीं दी गई थी। चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा मंजूरशुदा डा. निज्जर का फार्मूला नहीं अपनाया गया।

सितंबर, 2009 में जमीन का, जून, 2010 में सुपरस्ट्रक्चर और हैंड पंप व दिसंबर, 2017 में फल और गैर-फलों की जमीन का अवार्ड पास हुआ। प्रशासन ने कहा कि पेड़ों की वेल्यू हार्टीकल्चर और फोरेस्ट विभाग के टेक्नीकल एक्सपर्ट से करवाई गई। वहीं कहा गया कि फलों वाले और गैर-फलों वाले पेड़ों का मूल्यांकन पंजाब के डायरेक्टर ऑफ हार्टीकल्चर केएस जोशन के फार्मूला के तहत जून, 2004 मेंं करवाया था। यह वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित था। वहीं याची पक्ष ने मट्टू राम एवं अन्य बनाम यूटी केस का हवाला दिया। उसमें कोर्ट ने डा. निज्जर फार्मूला के तहत किए गए आंकलन के आधार पर वेल्यू के संबंध में याची पक्ष के केस में फैसला दिया था

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