चंडीगढ़। नगर निगम से जुड़े वर्ष 2014 के “टॉयलेट स्कैम’ में 2 साल पहले पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा मार्च, 2023 में अंतिम फैसले पर रोक लगाने(बाद में हटा दी गई थी) के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसले पर रोक लगा दी है। सीबीआई स्पेशल कोर्ट में 2016 से यह केस चल रहा है और मामला बहस पर है। सीबीआई केस में नगर निगम के तत्कालीन सुपरीटेंडिंग इंजीनियर रमेश चंद्र दीवान, जिम्मी सुबावल्ला, बिश्वदीप दत्ता, मयसा गणेश, सेलवेल मीडिया सर्विसेज प्रा.लि. को बिश्वदीप के जरिए और आउटडोर कम्यूनिकेशन प्रा.लि. को मयसा गणेश के जरिए आरोपी बनाया गया था। सीबीआई ने आपराधिक साजिश रचने, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत यह केस दर्ज किया था। एसएलपी काे हाईकाेर्ट से पहले सीबीआई कोर्ट ने 14 मार्च, 2024 को रद्द किया था। नवंबर, 2021 में सीबीआई कोर्ट ने दीवान व अन्यों के खिलाफ चार्ज फ्रेम किए थे। चार्ज फ्रेम की कार्रवाई को आरसी दिवान ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
सीबीआई काेर्ट में वीरवार सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष ने स्पेशल लीव पिटिशन(एसएलपी) में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 6 जनवरी को सुनाए गए आर्डर की कॉपी पेश की। बिश्वदीप दत्ता एवं अन्य बनाम सीबीआई वाली एसएलपी में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ट्रायल कोर्ट केस में अंतिम फैसला नहीं सुनाएगी। एसएलपी पर सुप्रीम कोर्ट में 26 फरवरी को सुनवाई होगी। उसमें सीबीआई को नोटिस भी जारी हुआ है। केस में हाईकोर्ट के 12 दिसंबर, 2024 के फैसले को चुनाैती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की हुई है। दूसरी ओर ट्रायल कोर्ट में सुनवाई के दौरान सीबीआई ने केस में आरोपी पक्ष द्वारा सीआरपीसी 313 के तहत बचाव में अतिरिक्त डॉक्यूमेंट्री एविडेंस पेश करने की अर्जी पर अपना जवाब पेश किया। अब सीबीआई जज अल्का मलिक ने बहस के लिए 3 मार्च की तारीख तय की है।
आरसी दिवान को मिली राहत के बाद बाकी आरोपियों की दलील:
हाईकोर्ट ने 2021 में आरसी दीवान की याचिका को आंशिक रूप से मंजूर कर उन्हें आईपीसी की सभी धाराओं में आरोमुक्त कर दिया था क्योंकि मामले में केस चलाने की स्वीकृति नहीं थी। उस आर्डर को देखते हुए सीबीआई कोर्ट ने दिवान के खिलाफ आरोपों में बदलाव करते हुए आईपीसी की धाराएं हटा दी थी। वहीं केस में प्राइवेट आरोपियों का कहना है कि उन्हें निगम कर्मियों के साथ साजिश रचने व अन्य धाराओं में आरोपी बनाया गया था। हालांकि दीवान के मामले में सेंक्शन के अभाव में हाईकोर्ट ने आईपीसी की धाराएं हटा दी थी। दीवान पर साजिश रचने की धारा हटने पर सह-आरोपियों ने कहा कि उन पर आरोप है कि उन्होंने निगम कर्मियों से साजिश रची मगर वह कौन हैं, इसका कोई जवाब नहीं है क्योंकि दीवान पर सािजश रचने की धारा हट गई है। ऐसे में उन पर धाराएं नहीं लगाई जा सकती। ट्रायल कोर्ट का कहना था कि हाईकोर्ट ने बाकी आरोपियों पर लगाई धाराओं को लेकर कुछ नहीं कहा था, ऐसे में उनकी धाराएं बदलने की कोई जरूरत नहीं है। वहीं हाईकोर्ट ने भी कहा था कि दीवान रिटायर हो चुके हैं इसलिए भ्रष्टाचार मामले में उनके खिलाफ केस चलाने के लिए सेंक्शन की जरूरत नहीं है। वहीं सह-आरोपी दीवान केस में आए आर्डर का फायदा नहीं उठा सकते क्योंकि उन्होंने दीवान की तरह याचिका दायर कर चार्ज फ्रेम की कार्रवाई को चुनाैती नहीं दी थी।
मामला:
2014 की एफआईआर में 2007 से 2014 के बीच का यह घोटाला 13.6 करोड़ रूपये का बताया गया था मगर अक्तूबर, 2016 में दायर चार्जशीट में सरकारी राजकोष को 25.80 लाख रूपये का नुकसान होने की बात कही गई थी। केस विभिन्न कमर्शियल कांप्लेक्स में 86 टॉयलेट ब्लॉक्स के ऑपरेशन और मेंटेनेंस को लेकर 2007 में जारी और अलॉट हुए दो टेंडर्स से जुड़ा है। सेलवेल मीडिया को यह टेंडर मिला था। पब्लिक टॉयलेट और इससे जुड़ी दिवारों पर विज्ञापन देने के बदले टॉयलेट्स की मेंटेनेंस की जानी थी। पंचकूला की तक्ष मीडिया नामक फर्म के अशोक मनुजा ने सीबीआई को शिकायत दी थी जिसमें सेलवेल को दिए टेंडर में वित्तिय अनियमितताएं बरतने के आरोप लगाए गए थे। आराेप के मुताबिक आरसी दीवान ने लाइसेंस फीस और एडवर्टाइजमेंट फीस/टेक्स मंे छूट दी थी। वहीं सक्षम अथॉरिटी से मंजूरी नहीं ली थी। बाद में भरपाई के लिए निगम ने सेलवेल को डिमांड नोटिस भी भेजा था। कांट्रेक्ट के मुताबिक न्यूनतम 500 रूपये फीस प्रति टॉयलेट के हिसाब से वसूली जानी थी मगर दीवान ने कथित रूप से इसमें छूट दी जिससे 25.80 लाख रूपये का नुकसान हुआ था।




