कोई बच्चे की पैरों की कैंची ठीक करवाने पहुंचा तो कोई एक्सीडेंट में पैर गवांने पर लिंब लगवाने आया

चंडीगढ़। देश में रोड एक्सीडेंट तेजी से बढ़ रहे हैं। आर्टिफिशियल लिंब लगवाने वालों में सबसे ज्यादा 18 से 34 साल के युवा शामिल हैं। यह कहना है नारायण सेवा संस्थान की डायरेक्टर वंदना अग्रवाल का। उनका कहना है कि दिव्यांगता से मुक्ति दिलाना हमारा उद्देश्य है। उनकी संस्था ने रविवार कम्युनिटी सेंटर, सेक्टर49 में फ्री ऑपरेशन जांच और लिंब व केलिपर्स मेजरमेंट कैंप लगाया। इसमें हिमाचल, हरियाणा, पंजाब, यूपी और चंडीगढ़ से दिव्यांग परिवार के साथ आए। 300 से ज्यादा दिव्यांगों का आर्टिफिशियल लिंब (हाथ -पैर) और केलिपर्स लगाने के लिए मेजरमेंट लिया गया। करीब 70 दिव्यांग रोगियों का केस ऑपरेशन के लिए रेफर किया गया।

यहां समाज कल्याण विभाग, महिला एवं बाल विकास, यूटी प्रशासन की टीम द्वारा दिव्यांगों को सरकार द्वारा विशिष्ट दिव्यांगता आईडी(यूडीआईडी) के तहत दी जाने वाली सुविधाओं के बारे में जानकारी दी गई। कैंप में सीसीपीसीआर की चेयरपर्सन शिप्रा बंसल व भाजपा नेता संजय टंडन भी पहुंचे। टंडन ने संस्थान को 1 लाख की डोनेशन के साथ हर संभव मदद का आश्वासन दिया। यहांं 450 से अधिक रोगी आए। इनमें बच्चे, बड़े, बुजुर्ग और महिलाएं शामिल थी। कैंप में 10 दिव्यांगों को व्हील चेयर भी बांटी गई।

पैरों में पड़ जाती है कैंची:
3 साल के जीवांश के पैरों में कैंची पड़ जाती है और वह चल नहीं पाता। उसके माता-पिता कर्मबीर और ज्योति भिवानी से ट्रेन में उसे बड़ी उम्मीद से यहां चैकअप केलिए लाए। उसके ऑपरेशन का सुझाव दिया गया है। इसी तरह नारायाणगढ़ के साढ़े 4 के ध्रुव का जनवरी, 2024 में एक गाड़ी से एक्सीडेंट हो गया था। उसका परिवार उसे इलाज के लिए लाया हुआ था। फतेहगढ़ साहिब से करीब 7 साल का दमनजोत सिंह अपने पिता गुरसेवक सिंह के साथ यहां पहुुंचा था। उसके बचपन से ही हाथ-पैर नहीं हैं। इसी तरह जालंधर से भीम व उसकी पत्नी अपने करीब 7 साल के बच्चे मन्नत को लेकर पहुंचे हुए थे। उसके भी हाथ-पैर बचपन से नहीं हैं।

इलेक्ट्रिसिटी शाॅक के बाद हाथ कटे मगर यूपीएससी की तैयारी जारी:
सेक्टर-39 के 19 वर्षीय कमल को 2017 में पानीपत में इलेक्ट्रिक शॉक लग गया था। काेहनी से ऊपर दोनों हाथ काटने पड़े थे। बॉडी बर्न हो गई थी। उसका सपना अफसर बनने का है और डीएवी काॅलेज से बीए की पढ़ाई के साथ ही यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं। वहीं पटियाला से आए 45 वर्षीय हरपाल सिंह के दोनों पैर एक्सीडेंट में चले गए थे। वह टैक्सी चलाते थे। कैंप में उन्हें आर्टिफिशियल लिंब लगाने की सलाह दी गई। अंबाला के 40 वर्षीय सुखविंदर सिंह का 2013 में रोड एक्सीडेंट के बाद पैर काटना पड़ा था। उन्हें नकली पैर लगा था, अब वह नया पैर लगवाना चाहते हैं।

संस्थान की डायरेक्टर वंदना अग्रवाल के मुताबिक 35-40 सालों से संस्थान विभिन्न सेवाएं दे रहा है। कई मरीजों के लिए उदयपुर संस्थान तक पहुंच पाना मुश्किल हाेता है। ऐसे में संस्थान हर रविवार देश के अलग-अगल जगहों पर ऐसे कैंप लगा रहा है। आर्थोपिडक डॉक्टर रोगियों की जांच करते हैं और जिन्हें सर्जरी की जरूरत होती है उन्हें उदयपुर बुलाया जाता है। जिन्हें आर्टिफिशियल लिंब लगाना होता है उनका माप लेकर 2 महीने बाद वहीं कैंप लगा लिंब लगाया जाता है। भारत समेत दुनिया भर के कई देशों मंे ऐसे कैंप लगाए जाते हैं। जल्द एक कैंप नेपाल में लगेगा। संस्थान की 450 से ज्यादा ब्रांच इंडिया में हैं। वहीं विदेश में 125 ब्रांच हैं।

जापान से सॉकेट इंपोर्ट करने पर विचार:
वंदना अग्रवाल ने बताया कि जो लिंब लगाए जाते हैं उनसे दिव्यांगों की जिंदगी में सार्थक बदलाव आ रहा है। हाथों की दिव्यांगता में थ्रीं-फिंगर्स वाले आर्टिफिशियल लिंब काफी हद तक रोजमर्रा के काम करने में सक्षम हैं। जापान से एडवांस क्वालिटी का सॉकेट मंगवाने पर भी बात चल रही है। संस्थान के पास पाकिस्तान से भी कई मरीज आ चुके हैं। 2012 से अभी तक 40 हजार से ज्यादा जरूरतमंदों को आर्टिफिशियल लिंब लगाए जा चुके हैं। फ्री सेवा के पीछे “भामाशाह’ का बड़ा योगदान होता है जो संस्थान को दान देते हैं।

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