चंडीगढ़। डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन(डीबीए) के 28 फरवरी को प्रस्तावित इलेक्शन से पहले ही प्रेजीडेंट पोस्ट के केंडीडेट अशोक चौहान के नॉमिनेशन को रद्द करने की मांग उठी है। इसके पीछे डीबीए, चंडीगढ़, 2003 के संविधान को आधार बनाया है। कहा गया है कि यह किसी भी मेंबर को 3 बार से ज्यादा डीबीए प्रेजीडेंट पोस्ट पर बैठने से रोकता है। एडवोकेट सतीश भारद्वाज ने चौहान के प्रेजीडेंट पोस्ट पर खड़े होने को चुनौती दी है। इलेक्शन कमेटी द्वारा मामले में मांगे गए जवाब पर डीबीए की मौजूदा एग्जीक्यूटिव बॉडी ने पूर्व एग्जीक्यूटिव बॉडीज द्वारा संविधान की पालना से जुड़े 23 साल पुराने संबंधित रिकार्ड की उपलब्धता न होने का हवाला दिया। इसे ढूंढने के लिए वक्त मांगा गया है। साथ ही कहा कि इलेक्शन कमेटी का गठन निष्पक्ष और पारदर्शी इलेक्शन के लिए किया गया है। ऐसे में संबंधित मुद्दा इसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
कमेटी ने सारे मामले को देखने के बाद कहा कि संविधान के रजिस्ट्रेशन को लेकर कोई विवाद नहीं है। पुरानी बॉडीज द्वारा की गई उल्लंघनाओं को जारी नहीं रखने दिया जा सकता। 23 साल पुराने संविधान में महत्त्वपूर्ण संशोधन की भी जरूरत है क्योंकि इसमें उल्लंघना को लेकर दंडात्मक प्रावधान नहीं हैं। कमेटी ने कथित उल्लंघनाओं को लेकर पूर्व बॉडीज पर कार्रवाई की सिफारिश न करते हुए जनरल हाउस के लिए मामला छोड़ दिया। वहीं कहा कि इस प्रेक्टिस को तुरंत खत्म करना महत्त्वपूर्ण है। ऐसे में मौजूदा एग्जीक्यूटिव बाॅडी को आदेश दिए गए हैं कि रजिस्ट्रार ऑफ फर्म्स एंड सोसाइटीज, चंडीगढ़ से पूरे रिकार्ड का निरीक्षण करें। वहीं डीबीए के पुराने साल का निरीक्षण करें ताकि पता लगाया जा सके कि क्या 2003 के बाद से इन प्रावधानों की पालना हो रही है।
24 या 25 फरवरी तक यह जनरल हाउस बुलाने को कहा गया है। मामले में दी गई रिप्रेजेंटेशन और शिकायत समेत दिए गए जवाब भी हाउस में रखी जाएं ताकि मामले में उचित फैसला लिया जा सके। 25 फरवरी तक यह कार्रवाई कर ली जाए ताकि शेड्यूल पर इलेक्शन हो जाएं। मामले से जुड़ी रिप्रेंजेटेशन, शिकायत, जवाब आदि बार काउंसिल ऑफ पंजाब एंड हरियाणा के चेयरमैन को तुरंत भेजे जाने के आदेश दिए गए हैं। उन्हें 2 दिनों में मामले में जवाब देने की प्रार्थना की गई है। रिटर्निंग अफसर देविंदर सिंह व बाकी 4 एआरओ की तरफ से यह आदेश जारी हुए हैं।
चौहान से यह जवाब दिया:
चौहान ने कमेटी को बताया कि वह 2005, 2013, 2014 और 2018 में 4 बार प्रेजीडेंट रह चुके हैं। पूर्व प्रेजीडेंट एनके नंदा द्वारा इस संविधान के रजिस्ट्रेशन के बाद 5 बार से ज्यादा प्रेजीडेंट पोस्ट हासिल की गई थी। संविधान के रजिस्ट्रेशन के बावजूद इसके प्रावधान पूर्व एग्जीक्यूटिव बॉडी द्वारा सच्ची भावना से लागू नहीं हुए। ऐसे में यह अव्यवहारिक दस्तावेज हैं। वहीं इस संविधान को चुनौती देते कई सिविल केस भी दायर हुए थे। हालांकि हाईकोर्ट से रद्द हो गए थे। इसके जवाब में सतीश भारद्वाज ने कहा कि पूर्व में संविधान के प्रावधानों की पालना न होना निरंतर हो रही उल्लंघनाओं को औचित्यपूर्ण नहीं ठहराता। एक बार संविधान रजिस्टर्ड हो जाए तो पालना बाध्य है। पुरानी एग्जीक्यूटिव बाॅडी द्वारा इनकी पालना न करने को इसके प्रावधानों से बचने के लिए डिफेंस नहीं लिया जा सकता।




