16 साल के स्टूडेंट को एक्सीडेंट क्लेम केस में हाईकोर्ट से 24 साल बाद मिला 1.31 करोड़ रुपये मुआवजा

चंडीगढ़। ट्रक से कुचले जाने पर वर्ष 2000 में 16 साल के स्टूडेंट को कई फ्रैक्चर आए, कई ऑपरेशन हुए, पैर काटना पड़ा, 86 प्रतिशत डिसेबिलिटी आई थी मगर उचित मोटर एक्सीडेंट क्लेम के लिए उसे 24 साल से ज्यादा का इंतजार करना पड़ा। हाईकोर्ट जस्टिस संजय वशिष्ठ ने पूरे केस, मेडिकल रिपोट्स आदि देखते हुए पीड़ित के लिए 1,31,47,200 रुपये का मुआवजा 7.5 प्रतिशत ब्याज समेत मंजूर किया है। वहीं कहा गया है कि यदि पुराना मुआवजा नहीं दिया गया है तो वह भी 9 प्रतिशत ब्याज समेत भरा जाए। आगे कहा कि अगर सुनाया गया मुआवजा 6 महीने बाद भी नहीं भरा जाता तो यह 12 प्रतिशत ब्याज समेत देना होगा। हादसे में मोंटी का बायां पैर कुचला गया था और काटना पड़ा था। उसे कई फ्रेक्चर आए थे। इंटेस्टाइन, यूरिनरी ब्लेडर समेत बाकी निजी अंगों में गंभीर चोटें आई थी। कई ऑपरेशन हुए थे।

मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक उसकी 86 प्रतिशत स्थाई डिसेबिलिटी पाई गई थी। कोर्ट ने कहा कि यह एक क्लासिक केस है जिसमें क्लेमेंट(पीड़ित) को उस मुआवजे से 24 साल तक वंचित रखा गया जो मोटर व्हीकल एक्ट का प्राथमिक उद्देश्य है। दुर्भाग्यवश इस देरी की जिम्मेदारी किसी अन्य पर नहीं बल्कि हमारे सिस्टम पर ही है। जिसे आत्मनिरीक्षण और आत्म-विश्लेषण की जरूरत है ताकि जल्द फैसले लिए जा सके, खासकर जो दर्द या संवेदनापूर्ण विषयों से जुड़े हों।

यूं हुआ था हादसा:
गगनदीप उर्फ माेंटी ने ट्रक ड्राइवर सुखबीर सिंह, इसके मालिक व इंश्योरेंस कंपनी को पार्टी बनाया था। माेंटी की ओर से एडवोकेट अश्वनी अरोड़ा ने दलीलें पेश की थी। मोंटी 18 जून, 2000 को 16 साल का था जब उसका एक्सीडेंट हुआ था। वह साइकिल पर सवार हो डड्डूमाजरा जा रहा था। साइकिल अजय चला रहा था। साइकिल को सीटीयू वर्कशॉप के पास ट्रक को लापरवाही और उतावलेपन में चलाते हुए हरियाणा नंबर के ट्रक चालक ने टक्कर मार दी थी। मोंटी को टक्कर में कई गंभीर चोटें आई थी। ट्रक ड्राइवर और मालिक न तो ट्रिब्यूनल में पेश हुए और न ही हाईकोर्ट में दायर इस अपील केस में काउंसिल के जरिए पेश हुए। वहीं इंश्योरेंस कंपनी ने यह कहते हुए क्लेम देने से मना कर दिया था कि ट्रक ड्राइवर के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था। सितंबर,2004 में चंडीगढ़ के ट्रिब्यूनल ने मोंटी के लिए 7.62 लाख रुपये मुआवजा 9 प्रतिशत ब्याज समेत मंजूर किया था। उस आर्डर में मंजूर मुआवजे को कम बताते हुए हाईकोर्ट में अगस्त, 2005 में अपील दायर की गई थी।

Share it :

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!