पुलिस ने गुमा दी 27 करोड़ रुपये के कथित बैंक घाेटाले की फाइल, आरोपी हो गए बरी; 2012 में दर्ज केस की ईओडब्ल्यू कर रही थी जांच

चंडीगढ़। 27 करोड़ रुपये से ऊपर के कथित बैंक घोटाले केस में आरोपी यूटी पुलिस की बड़ी लापरवाही के चलते 3 आरोपी सबूतों के अभाव में बरी हो गए। इनमें बैंक के तत्कालीन ब्रांच मैनेजर राजिंदर सिंह कलसी, करण ठाकुर और प्रदीप गोयल शामिल हैं। सेक्टर-11 थाना पुलिस ने बैंक के सीनियर मैनेजर कमलजीत सिंह की शिकायत पर केस दर्ज किया था। केस के मुताबिक वर्ष 2012 में पंजाब एंड सिंध बैंक की सेक्टर-24डी की ब्रांच से 116 लोन सेंक्शन हुए थे जो बाद में फर्जी निकले। पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज की लेकिन इन फर्जी लोन से संबंधित सभी असली कागजात पुलिस से गुम हाे गए। पुलिस के पास केवल इनकी फोटोकॉपी ही मौजूद थी जिनसे यह साबित नहीं हो सका कि वास्तव में बैंक ने जो यह लोन सेंक्शन किए थे वे फर्जी थे भी या नहीं। ऐसे में आरोपी बरी हो गए।

शिकायत के मुताबिक 1 नवंबर, 2012 को बैंक ने वार्षिक जांच की। इस दौरान हाउसिंग लोन के संबंध में कई गड़बड़ियां सामने आईं। जब गहनता से जांच की गई तो पता चला कि आरोपितों ने मिलकर फर्जी नाम और जाली कागजातों की मदद से 116 लोगों को हाउसिंग लोन सेंक्शन कर दिए। इस तरह बैंक को करीब 27 करोड़ का नुकसान हुआ। पुलिस ने इस मामले में 15 नवंबर, 2012 को राजिंदर सिंह कलसी, करण ठाकुर और प्रदीप गोयल को गिरफ्तार कर लिया। मामले में कुल 7 आरोपी थे जिनमें से एक की मौत हो गई थी। 2 को कोर्ट आरोपमुक्त कर चुकी है जबकि एक भगोड़ा है।
बचाव पक्ष की ओर से पेश एडवोकेट मुनीष दिवान ने बहस के दौरान कहा कि पुलिस का पूरा केस ही फर्जी था। पुलिस ने बैंक से सभी जरूरी कागजात अपने कब्जे में ले लिए थे, लेकिन उन्हें कभी कोर्ट में पेश नहीं किया। पुलिस ने खुद कबूल किया कि उनसे ये कागजात गुम हो गए थे। पुलिस के पास केवल फोटोकापी थी जिन्हें कभी किसी अथारिटी से वेरिफाई नहीं करवाया गया। पुलिस के पास न तो कोई गवाह थे और न ही सबूत थे।

मामले की जांच इकॉनामिक आफेंसिंग विंग(ईओडब्ल्यू) के पास थी। तब पुलिस ने इन सभी फर्जी लोन के वास्तविक कागजात बैंक से अपने कब्जेे में ले लिए थे। इनमें लोन लेने वालों के आधार कार्ड, पैन कार्ड, इंकम टैक्स रिटर्न, प्रापर्टी से संबंधित रिकार्ड, लोन अकाउंट फार्म आदि शामिल थे। जानकारी के मुताबिक यह करीब 8 से 9 हजार कागजात थे लेकिन पुलिस ने इनका वास्तविक रिकार्ड चार्जशीट में शामिल ही नहीं किया। जब गवाह के रूप मेें पुलिस कर्मियों की काेर्ट में गवाही हुई तब पता चला कि असली रिकार्ड तो पुलिस से गुम हो गया था। इतना ही नहीं, पुलिस ने रिकार्ड गुम होने की कोई डीडीआर या एफआईआर भी नहीं करवाई।

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